“रंजन” की कलम से : भारत ये महान कहलाए!

लूट और शोषण; धोखाधड़ी है भीषण,
रिश्वत की तरक्की हो रही है प्रतिक्षण।
गीता, कुरान के मान कहाँ अब?
झूठी कसम धरम जन खाए।
फिर भी भारत ये महान कहलाए।।
 
जाति लड़ाए; देश बटाए
मंत्री, संतरी के खूब जमे हैं।
मंदिर, मस्जिद गिरा – गिरा कर,
धर्म के ठेकेदार बने हैं।
पहन के खद्दर; ओढ़ के चद्दर,
देशभक्ति की ढोंग रचाए।
फिर भी भारत ये महान कहलाए।।
 
गरीबी नहीं; गरीबों को मिटाओ,
धनवानों के धन और बढ़ाओ।
अभी तो कुर्सी में है देरी,
पहले मत पैसों में तुलवाओ।
हम अपनी कमी सब पूरी करेंगे,
देश भले कंगाल हो जाए।
फिर भी भारत ये महान कहलाए।।
 
नौकर हो या नौकरी की अर्जी,
दफ्तर, चोंकी या अस्पताल, कचहरी,
बिन दक्षिणा के नाव मिले नहीं,
इश्वर हो या अल्लाह की अर्जी।
क्या चपरासी? क्या बाबू प्यारे?
कानून के रक्षक तक बिक जाए।
फिर भी भारत ये महान कहलाए।।
 
राम रहीम का देश यह भारत,
शहीदों के स्वप्नों की इमारत।
चाँदी के चमक में अब सब अंधे हैं,
मुल्ला, पंडित के धर्म नहीं; धंधे हैं।
अब कौन जलाए अमन दीप यह?
जब बिन स्वारथ सार ना पाए।
फिर भी भारत ये महान कहलाए।।

– R. R. JHA (RANJAN)

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“रंजन” की कलम से : सतत कर प्रयास तूं!

हो ना यूँ निराश तूं।
सतत कर प्रयास तूं।।

कुछ ही कदम दूर पर,
सफलता की राह पर,
तूं ताने सीना है खड़ा,
बढ़कर आगे देख ज़रा,
रचने को है इतिहास तूं,
क्यूँ है रे मन उदास तूं?
सतत कर प्रयास तूं।।

माना मुश्किलें हैं राहों में,
पर ना डिगना तूं प्रयास में,
बढ़ बुलंद हौसले के संग,
हिमालय सा अचल तूं बन,
दृढ़ता का आसमाँ ले तूं,
दिशाओं का बन प्रधान तूं।
सतत कर प्रयास तूं।।

तूं पर्याय है अनंत का,
तूं प्रशस्ति है ग्रंथ का,
तूं भास्कर है कालचक्र में,
तूं अर्थ है ब्रह्माण्ड का,
खुद को ले पहचान तूं,
रे भगवान नहीं मनुष्य है तूं।
सतत कर प्रयास तूं।।

– R. R. JHA (RANJAN)

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“रंजन” की कलम से : मेरी गति लिखना मौला ऐसा!

मेरी गति लिखना मौला ऐसा,
हो शहीद भगत सिंह के जैसा।
लिपटा हो जिस्म तिरंगे में,
गर मौत हो; चंद्रशेखर जैसा।
मेरी गति लिखना मौला ऐसा।।

जिस देश पर मिटने की ख़्वाहिश,
हर दिल में पली हो बचपन से।
जिस देश की मिट्टी को सींचा हो,
उनके बच्चे अपने खूँन से।
जिनके रग-रग में बहते हैं
जज़्बात वतन परस्ती के।
जिस देश की माँ लोरी में भी,
गाती हों गीत शहादत का।
उस धरती पर दंडवत होकर,
माँथे चंदन करूँ उनके रज का।
मेरी गति लिखना मौला ऐसा।।

काले पानी के सजा में रहूँ,
या झूलूं फाँसी पर जाकर।
गोली से छलनी हो जाए बदन,
बेशक सरहद के रखवाली पर।
क़ाफ़िर का मर्दन तबतलक करूँ,
जब तलक ना मेरा दम निकले।
टुकड़ों में बंट जाऊँ मैं भले,
पर साथ वतन का ना छूटे।
हर बूँद लहू पर गड़ा हो तिरंगा,
आवाज़ हो वंदेमातरम् का।
मेरी गति लिखना मौला ऐसा।।

मेरे शृंगार का सामान ऐसा हो,
कि कोई रंगरेज़ ना रंग पाए।
मेरी जश्न-ए-विदाई हो ऐसी,
कि वतन को भी गुमान आए।
उस शहीदि कुएं का दो बूँद मेरे,
मुँह में लाकर टपका देना।
वो जलियावाला बाग़ की मिट्टी,
लाकर स्नान करा देना।
जब रूख़सत हों डोली मेरी,
बारात हो वीर जवानों का।
मेरी गति लिखना मौला ऐसा।।

– R. R. JHA (RANJAN)

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“रंजन” की कलम से : नैनों से नयन दो-चार हुए!

नैनों से नयन दो-चार हुए,
दिल से दिल का तकरार हुआ,
कुछ उसने कहा; कुछ मैंने कहा,
इशारों ही इशारों में बात हुई,
इज़हार-ए-मुहब्बत ऐसी हुई,
महफ़िल सारा बीमार हुआ।
नैनों से नयन दो-चार हुए।।

बिन पंख उड़ूँ मैं हवाओं में,
बिन गीत के मैं सरगम गाऊँ,
बिन बात ठिठोली मैं खेलूँ,
बिन संग चलूँ मैं राहों के,
उसने जो छुआ मन को; मन से,
महफ़िल का भी शृंगार हुआ।
नैनों से नयन दो-चार हुए।।

फूलों से कहूँ; शृंगार तूं कर,
भवरों से लिपटकर प्यार तूं कर,
नदियों से कहूँ; इठलाकर चल,
आने वाली है बयार निर्झर,
उसने जो छुआ गीत होठों से,
महफ़िल का मन गुलज़ार हुआ।
नैनों से नयन दो-चार हुए।।

कुछ बयाँ हुई; कुछ अनकही रही,
कुछ बातों के सफ़र में रात गई,
उस मौसम के शहर में हुआ संगम,
सपनों के सृजन का आगाज़ हुआ,
उसने जो छुआ तन को; तन से,
महफ़िल खुद संगीत का तार हुआ।
नैनों से नयन दो-चार हुए।।

– R. R. JHA (RANJAN)

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“रंजन” की कलम से : मैं बाग़ी बन गया तुम्हारे प्यार में!

मैं बाग़ी बन गया तुम्हारे प्यार में।
वर्ना था आशिक सीधा सादा,
मैं भी इस संसार में।
मैं बाग़ी बन गया तुम्हारे प्यार में।।

मैं कुँवारा हूँ अबतक,
सजेगी कब सेहरा मेरे मांथे पर?
मैं दौर में हूँ शामिल,
ना जाने कब पहुँचुँगा साहिल तक?
सौ यत्न किए मैंने तुमको,
अपने बाँहों में भर लेने की।
तुम नयन इसारे समझ सके ना,
इन्सा के भरे बाज़ारों में।
ना ताज मिला, ना कुर्सी मिली,
ना मिली सनम सरकार में।
मैं लुट गया खड़ा खड़ा,
संसद दरबार में।
मैं बाग़ी बन गया तुम्हारे प्यार में।।

मैं उपदेशक नहीं विकासी था,
थे उदित हुए आंदोलन से।
लाए थे समर में लोग हमें,
करने विनाश दुर्योधन के।
हम भूल के अपना राजधर्म,
शामिल हुए आक्रांताओं में।
पर लुटे पिटे से रोते हैं,
हम इन छद्म वेश धारियों में।
नीयत बदली, फ़ितरत बदली,
सब राजनीति के आड़ में।
मैं हो गया पी कर टुल,
सत्ता के बार में।
मैं बाग़ी बन गया तुम्हारे प्यार में।।

मितरों भाईयों बहनों कहकर,
हमने था पटाया जनता को बहुँत।
हम थे विकास के महापुरुष,
पर लाचार हैं नौकरशाहों से बहुँत।
ना धन लाया, ना धन दिया,
धन बंट गए सब धनवानों में।
ऐसा भी नहीं कुछ किया नहीं,
है फिर भी गिनती जुमलेबाजों में।
नाराज सवर्ण, है नाराज दलित,
है नाराज सभी परिवार में।
मैं हूँ अलमस्त बनाकर मित्र,
इस संसार में।
मैं बाग़ी बन गया तुम्हारे प्यार में।।

R. R. JHA (RANJAN)

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“रंजन” की कलम से : माँ बन्दूक; कलम तूं दे–दे!

माँ बन्दूक; कलम तूं दे–दे,
लाकर मेरे हाथों में।
मैं भी देश की सेवा करूँगा,
शामिल हो वीर जवानों में।
माँ बन्दूक; कलम तूं दे–दे।।

कभी सीमाओं पर मैं बनकर के प्रहरी,
दुश्मन को सुलाऊँगा नींद में गहरी।
कभी ज्ञानी बनकर भटके हुए को,
दिखाऊँगा जीवन की राह सुनहरी।
कभी बनकर गाँधी अहिंसा का दीपक,
जाकर जलाऊँगा जन–जन में।
माँ बन्दूक; कलम तूं दे–दे।।

ना मौत का कहीं भी भय होगा,
ना युद्ध की होगी कहीं निशानी।
हर जन का जीवन सुखमय होगा,
“रंजन” की होगी दुनियाँ दीवानी।
तभी कहलाऊँगा मैं सच्चा सिपाही जब,
खुशियों के फूल खिलेंगे हर आँगन में।
माँ बन्दूक; कलम तूं दे–दे।।

– R. R. JHA (RANJAN)

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